समकालीन चिंतन
"क्रांति का नेतृत्व वही लोग कर सकते हैँ जो सबसे उन्नत सिद्धांत से निर्देशित होतें है" - लेनिन
'समकालीन चिंतन' के प्रकाशन का उद्देश्य हमारे देश पर अप्रत्यक्ष साम्राज्यवादी प्रभुत्व और उसके देशी राजनीतिक स्तम्भ बड़े पूँजीपति वर्ग, बड़े नौकरशाह, कुलक व धनी किसान, सामंती अवशेष और विदेशी पैसों से संचालित एनजीओ के खिलाफ जन चेतना का विकास कर मजदूरों, किसानों और अन्य शोषित-पीड़ित जनता को क्रांतिकारी मुक्ति संघर्ष की दिशा में प्रेरित करना है। यह पत्रिका पूर्व में प्रकाशित पत्रिका 'ध्रुवतारा' और 'चिंतनशैली' की वर्तमान कड़ी है।
औपनिवेशिक काल के मुक्ति संघर्ष में नेतृत्वकारी भूमिका हमारे देश के बड़े पूँजीपति वर्ग ने निभायी थी, जिसका अंत समझौता के रूप में हुआ और देश को आधी-अधूरी आजादी मिली। आज उसी समझौतापरस्त वर्ग के हाथ में देश की बागडोर है और पिछले 75 वर्षों में मेहनतकश और उत्पीड़ित जनता की बर्बादी व तबाही के लिए वही जिम्मेवार है। इसलिए इस नये मुक्तिसंघर्ष का नेतृत्व मजदूर वर्ग की ऐतिहासिक जिम्मेवारी है जिसे पूरा करने के लिए उसे साम्राज्यवाद और उसके देशी सहयोगियों के विरोध में खड़ी सभी जनवादी शक्तियों को एकजुट करना होगा।
आज का मजदूर वर्ग इस ऐतिहासिक जिम्मेवारी को उठा पाने में सक्षम नहीं है क्योंकि उसकी पार्टी (कम्युनिस्ट पार्टी) भटकवों का शिकार होकर कई टुकड़ों में बंट गयी है। ऐसी स्थिति में मजदूर वर्ग अवसरवाद के दलदल से फंस गया है और उसे इस दलदल से निकालकर क्रांतिकारी वर्ग के रूप में संगठित करना क्रांतिकारी शक्तियों की सबसे बड़ी जिम्मेवारी बन गयी है।
'समकालीन चिंतन' उपर्युक्त दोनों जिम्मेवारियों को स्वीकार कर इस दिशा में कार्यरत सभी बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को इससे जुड़ने की अपील करता है।
औपनिवेशिक काल के मुक्ति संघर्ष में नेतृत्वकारी भूमिका हमारे देश के बड़े पूँजीपति वर्ग ने निभायी थी, जिसका अंत समझौता के रूप में हुआ और देश को आधी-अधूरी आजादी मिली। आज उसी समझौतापरस्त वर्ग के हाथ में देश की बागडोर है और पिछले 75 वर्षों में मेहनतकश और उत्पीड़ित जनता की बर्बादी व तबाही के लिए वही जिम्मेवार है। इसलिए इस नये मुक्तिसंघर्ष का नेतृत्व मजदूर वर्ग की ऐतिहासिक जिम्मेवारी है जिसे पूरा करने के लिए उसे साम्राज्यवाद और उसके देशी सहयोगियों के विरोध में खड़ी सभी जनवादी शक्तियों को एकजुट करना होगा।
आज का मजदूर वर्ग इस ऐतिहासिक जिम्मेवारी को उठा पाने में सक्षम नहीं है क्योंकि उसकी पार्टी (कम्युनिस्ट पार्टी) भटकवों का शिकार होकर कई टुकड़ों में बंट गयी है। ऐसी स्थिति में मजदूर वर्ग अवसरवाद के दलदल से फंस गया है और उसे इस दलदल से निकालकर क्रांतिकारी वर्ग के रूप में संगठित करना क्रांतिकारी शक्तियों की सबसे बड़ी जिम्मेवारी बन गयी है।
'समकालीन चिंतन' उपर्युक्त दोनों जिम्मेवारियों को स्वीकार कर इस दिशा में कार्यरत सभी बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को इससे जुड़ने की अपील करता है।
मुख्य कहानी
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